| सिन्धु बेसिन में बहुउदृदेशीय-नदी घाटी परियोजना के विकास का इतिहास |
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देश के विभाजन तथा दो स्वतन्त्र राजनैतिक सत्ताओं भारत तथा पाकिस्तान का उदृभव होने से सिंधु जल के बंटवारे का विवाद हुआ तथा यह एक अर्न्तराष्ट्रीय मुददा बन गया । विश्व बैंक के तत्वाधान में भारत सरकारों के बीच लगभग 8 वर्षों तक हुए विचार विमर्श तथा बातचीत के परिणामस्वरूप सिंधु जल सन्धि हुई। इस सन्धि के अन्तर्गत तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास तथा सतलुज) का जल केवल भारत के उपयोग के लिए होगा तथा तीन पश्चिम नदियों (इंडस, झेलम तथा चिनाव) का जल केवल पाकिस्तान के उपयोग के लिए होगा। स्वतन्त्रता के बाद परियोजनाओं का विकासभाखडा–नंगल बांध परियोजना को 1948 में इतने सुनियोजित तरीके से शुरू किया गया कि सिंचाई तथा विद्युत के बढे हुए लाभ 1963 में भाखडा पर मुख्य बांध के पूर्ण होने से काफी पहले ही प्राप्त होने शुरू हो जाएं। 1954 में खेतों के लिए सिंचाई चैनल खोल दिए गए थे तथा भाखडा नंगल ग्रिड पर गंगूवाल विद्युत संयंत्र की प्रथम यूनिट ने 1955 में विद्युत उत्पादन करना प्रारम्भ कर दिया था। तीन नदियों का जल, जो सिन्धु जल सन्धि के पश्चात भारत के हिस्से में आया, का समुपयोजन करने के लिए मास्टर प्लान तैयार की गई । सिंचाई एवं विद्युत उत्वादन के लिए सतलुज नदी के जल को नियन्त्रित करते हुए सतलुज नदी पर भाखडा बांध का निर्माण किया गया। अगली नदी ब्यास नदी थी जिसे ब्यास परियोजना के माध्यम से और इसके ठीक बाद रावी को थीन बांध के माध्यम से बांध पाना था। ब्यास परियोजना
यूनिट-I ब्यास सतलुज लिंक आवश्यक रूप से एक विद्युत परियोजना है, तथा यह पंडोह में 4711 मिलियन क्यूमेक (3.82 एम.ए.एफ.) ब्यास जल को 1000 फीट नीचे सतलुज में अपवर्तित करती है। इस बिंदु पर देहर विद्युत गृह की अधिष्ठापित क्षमता 990 मेगावाट है, इसके बाद टेल रेस जल सतलुज से बहता हुआ भाखडा के गोबिन्दसागर जलशाय में एकत्रित हो जाता है। पंडोह से देहर तक अपवर्तन 38 कि.मी. लम्बी जल संवाहक प्रणाली द्वारा होता है जिसमें संयुक्त रूप से 25 कि.मी. लम्बी एक खुली चैनल तथा दो सुंरगें सम्मिलित हैं। ब्यास तथा सतलुज का
कुल जलग्रहण क्षेत्र क्रमश: 12560 कि.मी. तथा 56860 कि.मी. है।
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